गो उपस्थान ( गो शाला इत्यादि में यज्ञ के शुभ अवसर पर)

(देवराज विद्यावाचस्पति के  अग्निहोत्र सम्बन्धी गुरुकुल कांगड़ी द्वारा प्रकाशित निबन्ध के  आधार  पर )

सामान्य अग्निहोत्र की अतिरिक्त आहुतियां अथवा स्तुति मंत्र:

गो पूजन

1.         अन्धस्थान्धो वो भक्षीय, महस्थ महो वो भक्षीय, ऊर्जस्थार्जस्थोर्जं वो भक्षीय रायस्पोषस्थ रायस्पोषं वो भक्षीय  ॥ यजु 3.20

हे गौओ, (अन्ध:)  घी दूध आदि रूप अन्न के उत्पादक होने से व्यवहार  में अन्न (स्थ) हो, इस लिए आप की कृपा से मैं (व: ‌) तुम्हारे (अन्ध: ) दूध  घी आदि रूप  अन्न को (भक्षीय) सेवन करूं तुम (मह: ) पूज्यरूप (स्थ) हो ।  मैं तुम्हारे द्वारा प्रदत्त (व: )  पूज्यों  की कृपा से मैं  भी (मह: ) पूज्य  भाव को ग्रहण करूं, अथवा तुम (मह: ) दश वीर्य  रूप  को मैं (भक्षीय) सेवन करूं । (ऊर्ज: ) गो दुग्ध बल का हेतु है इसलिए व्यवहार में तुम बल रूप (स्थ) हो अत: (व: ) तुम्हारी कृपा से (ऊर्जम्‌ ) बल का  (भक्षीय) सेवन करूं (रायस्पोष: ) दूध आदि का विक्रय कर के धन के बढ़ाने के व्यवहार से तुम धन पुष्टिरूप (स्थ)हो अत: तुम्हारी कृपा से मैं (रायस्पोषम्‌) धन पुष्टि को ( भक्षीय ) सेवन करूं

2.         रेवती रमध्व्मस्मिन्योनावस्मिन्‌ गोष्ठेSस्मिँल्लोकेsस्मिन्‌ क्षये । इहैव स्त मापगात ॥ यजु 3.21

हे ( रेवती: ) धन वाली गायो ! यदि चाहो तो (अस्मिन्‌ )इस अग्निहोत्र की हवि के दोहनोपयोगी (योनौ) स्थान में (रमध्वम्‌) संचार प्रदेश  में विचरो, (अस्मिन्‌) इस यजमान की दृष्टि में रहने वाले (लोके) बाहिर  घूमने के प्रदेश में (रमध्वम्‌) विहार करो , अथवा रात्रि में (अस्मिन्‌) इस (क्षये) यजमान क्र हगृह में (रमध्वम्‌) विहार करो, इस प्रकार तुम्हें घूमने फिरने का प्रदेश प्राप्त होने से कुछ क्लेश नहीं होगा इस लिए तुम (इहैव) यहां ही यजमाने के पास (स्त) रहो,(मा अपगात) अन्यत्र न जाओ॥

3.  संहितासि  विश्वरूप्यूर्जामाविश गौपत्येन । उप त्वाग्ने   दिवेदिवे दोषावस्तर्धिया वयम्‌ । नमोभरन्त एमसि ॥ यजु 3.22

हे गौ: ! तू (विश्वरूपी) शुक्ल कृष्ण आदि बहुरूप वाली (संहिता) दूध घी आदि की हवि: देने के लिए यज्ञ कर्मों से संयुक्त (असि) हो ऐसी तुम (ऊर्जा) दूध घी आदि रस के गोपत्येन) गोस्वामी रूप से (मा) मुझ में (आविश) पूर्ण रूप से प्रविष्ट हो कि तुम्हारी कृपा से  मैं बहुत प्रकार के रस से और गोस्वामीपन से सम्पन्न हो जाऊं ॥ हे (अग्ने) अग्ने ! (दोषावस्त: ) रात्रि  में वसनशीलगार्हपत्य में (वयम्‌) हम यजमान (धिया) श्रद्धायुक्त बुद्धि से (नम:) नमस्कार (भरन्त: ) करते हैं  (दिवेदिवे) प्रतिदिन(त्वा)तुम्हारे पास  (उप एमसि) आते हैं ॥

3.         राजान्तमध्वराणां  गोपामृतस्य दीदिवम्‌। वर्द्धमानँ स्वे दमे ॥ यजु 3.23

(अध्वराणाम्‌) यज्ञों के (गोपाम्‌) गौओं के रक्षक (ऋतस्य) सत्य को (दीदिवम्‌) प्रकाशित करने वाले (स्वदमे) अपने घर में प्रदेश में  ( वर्धमानम्‌) वृद्धि के द्वारा (राजंताम्‌) उन्नतिको प्राप्त होते हैं ॥

4.         स न: पितेव सूनवे Sग्ने सूपायनो भव ।सचस्वा न: स्वस्तये ॥ यजु 3.24

हे अग्ने ! इस प्रकार  गुणों से  सम्पन्न तुम (न: ) हमारे लिए (सूपायन: ) सुख से प्राप्त हो सकने योग्य (भव) होवो। (इव) जैसे (पिता) पिता (सूनवे) पुत्र के लिए निर्भय सुगमता से  प्राप्त होता है, और (न: ) हमारे(स्वस्तये) कल्याण के लिए (सचस्व) कर्म मे युक्त होवो,(उसी प्रकार सब गुणोंसे सम्पन्न  गौ  की सेवा में युक्त हो कर हम सुगमता से  कल्याण मार्ग प्राप्त करें )  

5.         : अग्ने त्वंनो अ न्तमउत त्राता शिवो भवा वरूथ्य: । वसुरग्निर्वसुश्रवा अच्छा नक्षि द्युमत्तमँ रयिं दा: ॥ यजु 3.25

हे(अग्ने)  ऊर्जा बल शक्ति प्रदान करने वाली गौ माता  ( त्वम्‌) तुम (न: )  हमारे (अन्तम: ) समीपवर्ती (भवा) रहो, (उत) और (त्राता) रक्षक (शिव: )  शान्त (वरूथ्य: )गृह के लिए हितकारी  (भवा) हो आप. आप के द्वारा (वसु: अग्नि: ) सब को बसाने वाली ऊर्जा प्राप्त होती है, (वसुश्रवा) गौ के द्वारा प्राप्त धनादि साधन (अच्छ अनक्षि) हमारे घर पर पधरें और (द्युमत्तमम्‌) अति दीप्तियुक्त(रयिं दा: ) धन दें ॥

6.         तं त्वा शोचिष्ठ दीदिव: सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्य: । स नो बोधि श्रुधी हवमुरुष्या णो अघायत: समस्मात्‌ ॥ यजु 3.26

हे (शोचिष्ठ) अत्यंत दीप्तिमान (गौ माता ) (दीदिव: )सब को  चमकाने वाली ! (नूनम्‌)  निश्चय ही (सखीभ्य: )  अपने सब मित्रों के(सुम्नाय) सुख देने के लिए लिए (त्वा ईमहे )  आप से प्रार्थना करते हैं . (स: ) वह आप (न: ) हम को (बोधि) ज्ञान चेतना प्रदान करके (हवम्‌) हमारी पुकार को (श्रुधि) सुन कर (सम्स्तात) सब (अघायत: ) समाज का अहित करने वाले शत्रुओं से (न: ) हमारी (उरुष्य) रक्षा करने का सामर्थ्य प्रदान करो.

इसी संदर्भ में निम्न अथर्व वेद का मंत्र और अधिक स्पष्ट उपदेश  देता है.

अघायतामपि नह्या  मुखानि, सपत्नेषु वज्रमर्प्यैतुम्‌ ।
इन्द्रेण दत्ता प्रथमा शतौदना भ्रातृव्यघ्नी यजमानस्य गातु: ॥ अथर्व 10.9.1

7.         इड  एह्यदित्त एहि काम्या एत । मयि व: कामधरणं भूतात्‌ ॥ यजु 3.27

हे ( ईडे) गौ! (एहि) इस कर्म भूमि मे आ, हे ( अदिते) दिव्य्बगुणों की जननी गौ! (एहि) यहां आ । हे (काम्या: ) सब के द्वारा कामना योग्य गौओ ! (व: ) तुम्हारा (कामधारणम्‌ मयि भूयात्‌ एत ) तुम्हारी कृपा से  मैं तुम्हारे प्रति अनुराग से अभीष्टसुख  पाने  वाला बनूं ॥   

 

8.         सोमानँ वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते। कक्षीवन्तं य: औषिज: ॥ यजु 3.28

हे परमेश्वर प्रजा के पालक मुझे (कक्षीवन्त के समान)  गौसेवा में सदैव उद्यम (कमर कसे हुए ) द्वारा ऐश्वर्य को सम्पादन करने की क्षमता प्रदान कीजिए.

 

( इस संदर्भ में ऋग्वेद  ऋषि कक्षीवंत्‌ का  गौ सूक्त 10.169 प्रसिद्ध है )

9.         यो रेवान्‌ यो अमीवहा वसुवित्‌ पुष्टिवर्द्धन: । स न: सिषक्तु यस्तुर: ॥ यजु 3.29

(गौ सेवा द्वारा )ज्ञान रूप  धनादि सम्पन्नता, कृमीत्यादि रोग रहित स्वास्थ्य, जीवनमें पुष्टिकारक साधन , शीघ्रता से कार्य करने ( निरालस्य) का स्वभाव    हमें तुरंत प्राप्त हों .   

10.     मा न शँसो अररुषो धूर्ति:  प्रणङ्‌ मर्त्यस्य ।रक्षाण ब्रहस्पतये ॥ यजु 3.30

(गौ सेवा द्वारा) हमारे स्वभाव में कंजूसी छोड़ कर दान करने की , समाज सेवा करने की वृत्ति सदैव बनी रहे, हम मृदुभाषी और कुटिल आचरण से किसी को  कष्ट न पहुंचाएं . इस प्रकार हमारी रक्षा कीजिए ।

11.     महि  त्रीणामवोSस्तु  द्युक्षं मित्रस्यार्यम्ण: । दुराधर्षं  वरुणत्य ॥ यजु 3.31

सब के साथ स्नेह करने  के स्वभाव से हम आदरणीय बनें , अपने मानसिक शत्रुओं काम,क्रोध, द्वेष इत्यादि  को जीत कर जितेन्द्रिय बनने की हमारे मस्तिष्क मे ज्योति हो,  द्वेष से रहित हो कर हम अपराजेय बनें

 

 

12.     नहि तेषाममा चन नाध्वसु  वारणेषु । ईशे रिपुरघशँस: ॥ यजु 3.32

हानिकारक आचार  व्यवहार का, और हानिकारक वस्तुओं का आकर्षक  ढंग से प्रचार करने वाले हमें कहीं भी बहका ना सकें.  , घातक (रोगादि ) शत्रु  ( कीट  कृमि  इत्यादि)  कभी भी  घर में, मार्ग में, एकान्त में हमें दु:ख न दें॥   

13.     ते हि पुत्रासो अदिते: प्र जीवसे मर्त्याय । ज्योतिर्यच्छन्त्य  जस्रम्‌ ॥

यजु 3.33

उच्च , उत्तम मानव  जीवन के लिए हमारा शरीर पूर्णतया स्वस्थ, हमारी  मानसिकता सदैव पवित्र विचार वाली हो  

14.      कदाचन सस्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि  दाशुषे । उपोपेन्नु मघवन्‌ भूयsइन्नु ते दानंदेवय पृच्यते ॥ यजु 3.34

कभी भी स्वार्थ वश हिंसा न करें. हमें दान वृत्ति से किए कर्म द्वारा पापशून्य  ऐश्वर्य  प्राप्त हो ।

 

15.     ॐ तत्‌ सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो न: प्रचोदयात्‌ ॥ यजु 3.35

सर्ष्टिकर्ता धारक,  संचालक,  पालक  परमेश्वर की व्यवस्था  के  अनुकूल आचरण  का मैं  वरण करता हूं. निराशा अकर्मण्यता  के अंधकार को ध्वस्त करने वाली देवताओं की  सदैव उत्साह पूर्ण विद्युत प्रकाश समान ज्योति हमारी बुद्धि को प्रेरित करे और हमें उत्कर्ष की ओर ले जाए.

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